चर्चा मुम्बई धमाकों पर नहीं माफी पर करो

अभी एक सप्ताह भी नहीं व्यतीत हुए हैं कि जब 1993 में मुम्बई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना अंतिम फैसला सुनाया था । इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ अति महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ भी की थीं। मजहबी कट्टरता के आधार पर हिंसा की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए न्यायालय ने उसकी निंदा की और मुम्बई धमाकों के लिये पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई एस आई को दोषी ठहराते हुए सीमा पार बैठे हुए लोगों को इस पूरे बम धमाकों का सूत्रधार बताया और इन अपराधियों को देश लाने का अधूरा कार्य पूर्ण करने की आवश्यकता जताई।

परंतु यह अत्यंत अचरज का विषय है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद इस न्यायालय की ओर से की गयी इन टिप्पणियों पर देश में बहस होने के स्थान पर इस मामले में दोषी पाये गये लोगों को माफी देने के लिये पैरवी हो रही है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता संजय दत्त को गैर कानूनी रूप से हथियार रखने के आरोप में दोषी पाया गया और उन्हें पाँच साल की सजा दी गयी। परंतु यह फैसला आने के कुछ ही घन्टों के बाद पूरे देश में संजय दत्त को माफ करने को लेकर बहस आरम्भ हो गयी। पहले यह बहस मीडिया और फिल्मी जगत तक सीमित रही परंतु शीघ्र ही प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष और मानवाधिकार के स्वयंभू एकपक्षीय संरक्षक मार्कण्डेय काटजू ने संविधान के अंतर्गत राज्यपाल को विशेष परिस्थितियों में सजा को माफ करने के विशेषाधिकार का हवाला देकर एक नयी बहस छेड दी। काटजू ने न केवल संविधान के अनुच्छेद 161 का हवाला दिया जिसके अंतर्गत राज्यपाल को यह अधिकार प्राप्त है वरन उन्होंने संजय दत्त को माफ करने की सिफारिश करते हुए राज्यपाल को एक पत्र भी लिख दिया।

इस पूरे मामले में मीडिया ने कानून को लेकर दो रवैया अपनाने की बात उठायी और इसका लाभ उठाकर टाडा अदालत से दोषी एक और अभियुक्त ज़ैबुन्निशा काजी की पुत्री ने भी अपनी माँ को माफी दिये जाने की माँग की है। पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने इस मामले में भी राष्ट्रपति और महाराष्ट्र के राज्यपाल को इस दोषी को माफ करने की सिफारिश करते हुए एक पत्र लिखने की बात कही है।

इन दोनों मामलों ने हमारे समक्ष कुछ गम्भीर प्रश्न खडे कर दिये हैं। क्या भारत में वामपंथी उदारवादी रुझान के लोग इस प्रकार एकाँगी और एकपक्षीय सोच के हो गये हैं कि वे अब अपनी ही न्याय व्यवस्था और व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खडा करने पर उतारू हो गये हैं? क्या मुम्बई धमाकों के लिये जिम्मेदार सीमा पार छुपे हुए लोग इतने शक्तिशाली हैं कि अब भी बालीवुड उनके इशारों पर नाचता है और वे सीमा पार होने के बाद भी कुछ ही घण्टों में माफी के लिये मुहिम चला सकते हैं? क्या हमारे देश का मीडिया इस कदर भ्रमित है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उठाये गये सवालों पर चर्चा करते हुए दाउद इब्राहिम को भारत लाने के लिये सरकार पर दबाव बनाने के स्थान पर इस बात पर चर्चा कर रहा है कि टाडा अदालत से दोषी लोगों को एक बाद एक कैसे माफी दी जाये?

ऐसा केवल इसलिये सम्भव हो सका है कि देश का नीति निर्धारक वर्ग  और मीडिया पूरी तरह वामपंथी उदारवाद के न्यायहीन मार्ग पर चला गया है। आखिर वामपंथी उदारवादियों का दोहरा चरित्र देखिये कि वर्ष 2002 में हुए गुजरात के दंगों को लेकर वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को समस्त विश्व में दोषी ठहराने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं जबकि आज तक एक भी न्यायालय ने उन्हें इसके लिये उत्तरदायी नहीं पाया है तो वहीं दूसरी ओर निचली अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक  मुम्बई धमाकों में दोषी सिद्ध किये गये लोगों के लिये माफी की मुहिम चलायी जा रही है।

इस पूरे घटनाक्रम से न केवल इन वामपंथी सोच के लोगों का आडम्बर सामने आता है वरन आंतरिक और बाह्य मोर्चे पर भारत एक ऐसे कमजोर राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत होता है जहाँ कि विचारधारा के आधार पर कानून का परिपालन होता है और कम्युनिष्ट व्यवस्था की तरह समाज में शास्वत रूप से शोषक और शोषित की परिभाषा बना दी गयी है।

यदि कोई देश इस आधार पर अपनी व्यवस्था का संचालन करने लगे तो भविष्य का संकेत लगाया जा सकता है। मुम्बई धमाकों के दोषियों को माफी देने का अभियान एक खतरनाक आरम्भ है यदि ऐसी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिये सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर अभियान नहीं चलाया गया तो आने वाले समय में अनेक चुनौतियों का सामना करना पडेगा। इस प्रकार वामपंथी उदारवादियों को देश के भविष्य के  साथ खेलने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिये।

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