मोदी से कौन डरता है?

भारत में आम चुनाव होने में वैसे तो अभी एक वर्ष का समय शेष है परंतु जिस प्रकार की चर्चायें और बहस राजनीतिक विश्लेषकों और राजनीतिक दलों के मध्य चल रही है उससे तो अलग ही संकेत मिलते दिखायी दे रहे हैं। इन सबके मध्य यह अवश्य विचारणीय विषय है और शोध का भी विषय है कि गुजरात के मुख्यमंत्री देश और देश से बाहर सर्वाधिक चर्चा के केंद्र में क्यों है? गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की राजनीति को ध्रुवीकृत कर दिया है  हालाँकि उस संदर्भ में नहीं जैसा कि उनके विरोधी चाहते हैं परंतु इतना अवश्य है कि आज की स्थिति में या तो आप मोदी के समर्थक हैं या उनके विरोधी । इसमें तटस्थ जैसी कोई बात नहीं रह गयी है। इसलिये इस पर चर्चा करना स्वाभाविक है कि नरेंद्र मोदी  विश्व भर के वामपंथियों और समाजवादियों को  क्यों फूटी आँखों नहीं सुहाते? इस विषय को जानने के लिये हमें देश की स्वतन्त्रता के पश्चात की राजनीति की कुछ पृष्ठभूमि में जाना होगा। देश को स्वतन्त्रता प्राप्त होने के पश्चात देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अपनी नास्तिक विचारधारा और स्वप्निल विश्व की धारणा के चलते वामपंथी थे और इसी आधार पर उन्होंने देश की आर्थिक,  विदेश नीति और प्रशासनिक नीति का निर्माण किया। जवाहर लाल नेहरू के कद और देश पर उनकी पकड के चलते उनके समाजवादी विकास के माडल पर किसी ने प्रश्न भी नहीं उठाया और कोई उठा भी नहीं सकता था।

इसी कारण देश के प्रमुख संस्थानों पर जिनसे कि जनमत का निर्माण होता है वामपंथियों का एकाधिकार  हो गया । नेहरू जी की मृत्यु के पश्चात लाल बहादुर शास्त्री इतने कम समय तक देश के प्रधानमंत्री रहे कि  वे अपनी विचारधारा का कोई प्रभाव नहीं छोड सके। लाल बहादुर शास्त्री के पश्चात जब श्रीमती इंदिरा गाँधी को देश की कमान मिली तो वरिष्ठ कांग्रेसियों से उनका संघर्ष हुआ और इसी दौरान 1967 में पुराने राजा महाराजाओं की धरती राजस्थान में जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी ने विधानसभा में लगभग बहुमत का आँकडा प्राप्त कर लिया था। इस घटनाक्रम ने इंदिरा गाँधी को अत्यंत विचलित किया और राजा महाराजाओं की समृद्धि के चलते उन्हें विपक्ष का यह उभार भविष्य के लिये खतरनाक दिखा और उन्होंने आनन फानन में समाजवादी व्यवस्था की बात करनी आरम्भ कर दी।  राजाओं,  महाराजाओं  के विशषाधिकार छीन लिये गये, बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और संविधान में भी समाजवाद को शामिल कर लिया गया। इसी क्रम में जब कांग्रेस में इंदिरा गाँधी को अपने वरिष्ठ सहयोगियों का सहयोग नहीं मिला तो उन्होंने कम्युनिष्टों का साथ लिया और बदले में इन वामपंथियों ने जवाहर लाल नेहरू के समय से देश के प्रमुख अकादमिक और सांस्कृतिक संस्थानों पर अपने एकाधिकार को जारी रखने की शर्त रखी ।

पहले जवाहर लाल नेहरू और फिर इनकी पुत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने जिस समाजवादी माडल को अपनाया उसमें दो प्रश्नों के आधार पर ही देश की सारी राजनीति चलाई गयी। गरीबी दूर करने का संकल्प और सेक्युलरिज्म के प्रति प्रतिबद्धता । इन्हीं दो वायदों के आधार पर देश की सारी राजनीति अभी तक चलती आयी और कांग्रेस , वामपंथी और समाजवादी दलों ने स्वयं को इसका सबसे बडा मसीहा सिद्ध किया है। वैसे यह बात और है कि इसी समाजवादी विकास माडल के चलते देश का विकास नहीं हो सका। देश में उद्यमता को प्रोत्साहन नहीं मिला, देश के युवा की सबसे बडी आकाँक्षा सरकारी नौकर और क्लर्क बनने की होती है। साथ ही गरीबी दूर करने के नाम पर प्रतिवर्ष घोषित होने वाली कल्याणकारी योजनायें अफसरशाही से लेकर सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं के लिये धन कमाने का सबसे बडा आधार बन जाती हैं। अफसरशाही के जाल में फँसकर सामान्य जनता घूसखोरी को अपना भाग्य मान लेती है। नरेंद्र मोदी ने गुजरात के अपने शासन में देश की दो सबसे बडी चुनौतियों का समाधान देश को दिया है गरीबी दूर कर रोजगार के नये अवसर प्रदान करना और बिना किसी का तुष्टीकरण किये समाज में साम्प्रदायिक सद्भाव और भाईचारा बनाये रखना। साथ ही शासन को जनसेवा का माध्यम बनाकर उसे अधिक पारदर्शी बनाना ताकि जनता के काम सरकारी विभागों में आसानी से हो सकें।

नेहरूवादी समाजवाद से परे नई शासन प्रणाली के द्वारा इन प्रश्नों का समाधान हो जाने से देश में वामपंथियों को अपनी सत्ता डोलती नजर आ रही है। विश्व के अन्य स्थानों की भाँति भारत में भी वामपंथियों ने जनसमर्थन न होते हुए भी शासन वर्ग और कुलीन वर्ग मे पैठ बनाकर अपने एजेंडे को लागू करवाने में सफलता प्राप्त की है। देश की स्वतंत्रता के बाद से वामपंथी शासक वर्ग को गुमराह कर अपनी वैश्विक दृष्टि के आधार पर देश की नीतियों का निर्माण करवाते रहे हैं। पहली बार उन्हें यह अनुभव हो रहा है कि देश में नयी व्यस्था का सूत्रपात हो सकता है जो कि उनके विशेषाधिकार के लिये नयी चुनौती बन सकता है और बिना किसी उत्तरदायित्व के सत्ता का आनन्द उठाने की उनकी पुरानी आदत को विराम लग सकता है। वामपंथियों द्वारा जनमत और संविधान के दायरे में आये बिना शासन करने का सबसे नवीन उदाहरण यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी के नेतृत्व में चल रही राष्ट्रीय सलाहकार परिषद है। इसके सभी सदस्य वामपंथी रुझान के हैं और इसी आधार पर अपनी वैश्विक और राष्ट्रीय दृष्टि से देश की नीतियों का निर्धारण करना चाहते हैं। इस देश में स्वतंत्रता के पश्चात से अब तक गरीबी हटाने के नाम पर देश और समाज में जड्ता का वातावरण पैदा कर दिया गया और देश अपने साथी देशों से पीछे होता चला गया। इसी प्रकार सेक्युलरिज्म के नाम पर देश में मुसलमानों के मन में हिंदुओं का खौफ पैदाकर वोट बैंक मजबूत किया गया और ईमानदारी से कभी दोनों समुदायों को साथ लेकर देश के विकास में भागीदार बनाने का प्रयास नहीं हुआ। गुजरात के मुख्यमंत्री ने इन दोनों ही समस्याओं के समाधान का न केवल फार्मूला दिया है वरन उसके लागू करके दिखाया है।

भारत ही नहीं वरन विश्व के वामपंथी जानते हैं कि यदि भारत जैसे बडे देश में वामपंथी शासक और कुलीन वर्ग का हिस्सा नहीं रहेंगे तो इससे समस्त वामपंथी आंदोलन पर नकारात्मक प्रभाव होगा और यही कारण है कि समस्त वामपंथियों  और समाजवादियों ने  एक स्वर से नरेंद्र मोदी के विरुद्ध मोर्चा  खोल रखा है।

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